Saturday, 12 June 2021

हम सब का बचपन एक जैसा बीता होगा

 


कभी चढ़ते उतरते समय
लुढ़क कर चोट खाई है!
झाड़ कर घुटनों की मिट्टी को
सब ठीक है सोच
दौड़ लगायी है!

कभी झूले की ऊंची-ऊंची पेंग लगायी है
रोक दो गिर ना जाऊं चीख मारी है
धीमे होते ही फिर से
ऊंचा उड़ने की चाह जतायी है

कभी बिना लेय सुर ताल के गीत गाया है
उल्टे सीधे कदमों से नाच बनाया है
रंगों को घोल के नया रंग बनाया है
पुरानी किताबों को जांच कर मन बहलाया है

चुन्नी की सारी पहनी होगी
पत्तों की सब्जी भी बनाई होगी
अपने दोस्तों संग दुकान भी लगायी होगी
बेझिझक बे परवाह धूप मे घूमें होंगे
बारिश मे भीगे होंगे
मट्टी मे खेले होंगे

हम सब का बचपन एक जैसा बीता होगा

सबसे अलग होने की इच्छा
तो बड़े होने पे आती है
होशियार होते ही
हर कदम पर होशियार कर जाती है








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