अंतहीन
Saturday, 11 August 2012
वोह स्पर्श याद है
इन हथेलियों को अभी भी वोह स्पर्श याद है
आपके साथ बीते हर पल याद है
वोह गर्व से देखना वोह प्यार से निहारना
वोह पीठ की थपथपी वोह निस्वार्थ हर्ष याद है
इन हथेलियों को अभी भी वोह स्पर्श याद है
इतवार कि वोह इति
गुज़र गए ६ माह ६ युगों कि तरह
यादें और गहराती गयीं
जितना हंसी में दबाना चाहा
आँखे और ज्यादा डबडबाती गयीं
काश सही कर सकूं उस रविवार जो गलत हुआ
...........इतवार कि वोह इति
............जीवन भर का अंत हुआ....
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