Friday, 17 February 2012

अंतहीन शुन्य

अभी तो उठ के बैठे थे
चाय की चुस्कियों के साथ
अखबार ले हाथ
गुड मोर्निंग का सलाम किया था


एक पल में ऐसा क्या हुआ
जो साथ ही तोड़  गए
एक शुन्य पीछे छोड़ गए

थप्पड़ कीवोह गूँज  गाल पर उंगलीयों के निशाँ
पहाड़े रटने की वोह अँधेरी रात
हर शुक्रवार को स्कूटर पर आगे झुक कर बेठना
हिंदी फिल्म देख सिज्जलर खाना
गर्मियों की छुट्टी में धोलपुर जाना


आपका न सुनना मेरा चिल्लाना
आपका गुस्सा होना मेरा मनाना
हर आशा पूरी करना
हर सिलवट को मिटाना
छोटी सी बात पर खुश हो जाना
कुछ न कहने पर भी
सब कुछ जान जाना


यह सब और बहुत कुछ और
जीवन का हिस्सा है ......पर इनको रचने वाले ने
मुहँ ही मोड़ लिया
तनहा छोड़ दिया

कितनी यादें साथ ले चलेगये
कितनी  बातें अनकही छोड़ चले गए



उनका जीवन में योगदान है अंतहीन
उनकी यादें हैं अंतहीन
उनका जाना समझ न आया
यह ना समझी है अंतहीन


 आपकी यादों को समेटे जीलेंगे हम
उस आसमान से हम पर नज़र ज़रूर रखना
इस   अंतहीन शुन्य   को आँसूं बन कर बहने ना देंगे हम
आपने में ही समेट कर हँसना सीख लेंगे हम....












Wednesday, 1 February 2012

अलविदा मौसा

बहते  आंसू  थम गए...
हम काम में रम गए...
फिर भी दिल उदास है....
रह रह कर याद आ जाता है
वोह दिन बचपन का 
जब आप से मिलने 
चले आते थे हम 
घर पर आपके धमा चोकड़ी
 मचाते थे हम 
कुछ तो खास था जो संगत में आपकी
 मुस्कुराते  थे हम
आपका जाना यह सिखा गया
कोई नहीं अपना 
अपनों के सिवा 
कुछ नहीं रहता स्थिर 
यादों के सिवा