Friday, 30 November 2012

आ रहा है दो दिसम्बर

आ रहा है  दो दिसम्बर  
 मुस्कराहट आयी चेहरे  पर 

कहीं दिल में एक चुभन सी है 
किसे कहें हैप्पी बर्थडे 

फिर सोचा .......

जहाँ भी हों आप हमसे तो दूर हो ही नहीं सकते 
जब देख सकते हो हमें तो सुन भी तो हो सकते 
चिल्ला चिल्ला कर आज आप तक यह सुर पहुँचाना है 
हैप्पी बर्थडे पापा यह सुनाना है 

आप थे तो खूब उत्साह से इस दिन को मनाते थे 
आप नहीं हैं तो उन दिनों को याद करके मनायेंगे 
याद तो आप हमेशा रेहते  हैं 
आज कुछ ज़यादा याद आयेंगें 
दिल की चुभन को हावी न होने देंगे हम 
सिर्फ और सिर्फ मुस्कुरायेंगे 

आ रहा है दो दिसम्बर 
 सिर्फ और सिर्फ मुस्कुरायेंगे 

Saturday, 11 August 2012

वोह स्पर्श याद है



इन हथेलियों को अभी भी वोह स्पर्श याद है
आपके साथ बीते  हर पल  याद है
वोह गर्व से देखना वोह प्यार से निहारना
 वोह  पीठ की थपथपी वोह निस्वार्थ हर्ष याद है
इन हथेलियों को अभी भी वोह स्पर्श याद है 

इतवार कि वोह इति

 गुज़र  गए ६ माह ६ युगों कि तरह
यादें और गहराती गयीं 
जितना हंसी में दबाना चाहा
आँखे और ज्यादा डबडबाती गयीं 
काश सही कर सकूं उस रविवार जो गलत हुआ 
...........इतवार कि वोह  इति
............जीवन भर का अंत हुआ....

Sunday, 11 March 2012

जब धरती फटी पैरों तले

बीत गया एक माह
एक युग को बीते
वोह पल फिर लौट आया
जब धरती फटी पैरों तले


एक दृढ स्तंभ भिखर गया 
एक शांत समुन्दर बिफर गया 
एक उड़ता बादल बरस गया
एक हवा का झोंका ठहर गया 
जब धरती फटी पैरों तले


कुछ भी तो नहीं बदला
सब शांत सा है पहले की तरह
दिल में अरमान हैं
मन में उम्मीदें  हैं
होठों  पर मुस्कान हैं 
मैं भी तो वहीं खड़ी हूँ
उस घडी में खुद को कैद कर
जब धरती फटी पैरों तले


फटी धरती पर .............मुस्कुरा कर....







Friday, 17 February 2012

अंतहीन शुन्य

अभी तो उठ के बैठे थे
चाय की चुस्कियों के साथ
अखबार ले हाथ
गुड मोर्निंग का सलाम किया था


एक पल में ऐसा क्या हुआ
जो साथ ही तोड़  गए
एक शुन्य पीछे छोड़ गए

थप्पड़ कीवोह गूँज  गाल पर उंगलीयों के निशाँ
पहाड़े रटने की वोह अँधेरी रात
हर शुक्रवार को स्कूटर पर आगे झुक कर बेठना
हिंदी फिल्म देख सिज्जलर खाना
गर्मियों की छुट्टी में धोलपुर जाना


आपका न सुनना मेरा चिल्लाना
आपका गुस्सा होना मेरा मनाना
हर आशा पूरी करना
हर सिलवट को मिटाना
छोटी सी बात पर खुश हो जाना
कुछ न कहने पर भी
सब कुछ जान जाना


यह सब और बहुत कुछ और
जीवन का हिस्सा है ......पर इनको रचने वाले ने
मुहँ ही मोड़ लिया
तनहा छोड़ दिया

कितनी यादें साथ ले चलेगये
कितनी  बातें अनकही छोड़ चले गए



उनका जीवन में योगदान है अंतहीन
उनकी यादें हैं अंतहीन
उनका जाना समझ न आया
यह ना समझी है अंतहीन


 आपकी यादों को समेटे जीलेंगे हम
उस आसमान से हम पर नज़र ज़रूर रखना
इस   अंतहीन शुन्य   को आँसूं बन कर बहने ना देंगे हम
आपने में ही समेट कर हँसना सीख लेंगे हम....












Wednesday, 1 February 2012

अलविदा मौसा

बहते  आंसू  थम गए...
हम काम में रम गए...
फिर भी दिल उदास है....
रह रह कर याद आ जाता है
वोह दिन बचपन का 
जब आप से मिलने 
चले आते थे हम 
घर पर आपके धमा चोकड़ी
 मचाते थे हम 
कुछ तो खास था जो संगत में आपकी
 मुस्कुराते  थे हम
आपका जाना यह सिखा गया
कोई नहीं अपना 
अपनों के सिवा 
कुछ नहीं रहता स्थिर 
यादों के सिवा