Friday, 7 October 2011

एक आहट


हलकी सी एक आहट से नींद टूटी

सपनो की नगरी पीछे छूटी
 
पर्दों से सरक आती  किरणों ने  होसला दिया

मुस्कराहट के साथ एक नए दिन का स्वागत किया



नन्ही हथेलियों का गालों को सहलाना 

उन मासूम आँखों का बिन कुछ कहे सब कह जाना

दिन भर खुद को और बढ़िया करने में मशगूल  करता है

जो आये थे  सपने वो  तो याद नहीं

पर उनको पूरा करने को मजबूर करता है


घूम के  चक्र समय का फिर आ खड़ा  होजायेगा

अँधेरे की ठंडक में सारा ताप खो जायेगा

शायद वो सपना फिर याद आ जाये

कैसे होगा पूरा यह बता जाये

या फिर शुरू से होगा आरंभ वो

और हर दिन होगा प्रारंभ यूँ
............
हलकी सी एक आहट से नींद टूटी

सपनो की नगरी पीछे छूटी


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