हलकी सी एक आहट से नींद टूटी
सपनो की नगरी पीछे छूटी
पर्दों से सरक आती किरणों ने होसला दिया
मुस्कराहट के साथ एक नए दिन का स्वागत किया
नन्ही हथेलियों का गालों को सहलाना
उन मासूम आँखों का बिन कुछ कहे सब कह जाना
दिन भर खुद को और बढ़िया करने में मशगूल करता है
जो आये थे सपने वो तो याद नहीं
पर उनको पूरा करने को मजबूर करता है
घूम के चक्र समय का फिर आ खड़ा होजायेगा
अँधेरे की ठंडक में सारा ताप खो जायेगा
शायद वो सपना फिर याद आ जाये
कैसे होगा पूरा यह बता जाये
या फिर शुरू से होगा आरंभ वो
और हर दिन होगा प्रारंभ यूँ
............
हलकी सी एक आहट से नींद टूटी
............
हलकी सी एक आहट से नींद टूटी
सपनो की नगरी पीछे छूटी
No comments:
Post a Comment