दियों की जगमगाहट छाई चहूँ ओर
पटाकों की गूँज से थिरक उठी है वसुंधरा
हर मुख पे है हंसी
हर पग में है उत्साह
सब के हृदय में भर रही है सफलता की किरण यह रौशनी
उन्नति की धूम यह गूँज
इसी रौशनी ने छिपा रखा है कई घरों का अँधियारा
इसी गूँज में डूबी हैं कई सिसकियाँ
इन खुशियों के आँगन में कुछ पड़ाव ऐसे भी हैं
जहाँ न गूँज है न रौशनी
इस ख़ुशी में जी रहे हैं वहां के परिंदे
कि उनकी झोपडी जगमग है
हवेलियों की रौशनी से
Tuesday, 25 October 2011
Sunday, 16 October 2011
मंजिल होगी सामने ज़िन्दगी जो देगी बदल
तनहाइयों की ओट से बाहर निकल
आकाश के आँचल में ढूंढ ले अपना कल
रiह तू अपनी बना ...बनी राहों पे न चल
मंजिल होगी सामने ज़िन्दगी जो देगी बदल
उम्मीद के दामन को थामे रख
धीरे ही सही बढ़ा तू अपने पग
गिरना और संभलना चढ़ने की हैं बेहनें
इनकी बाहें थाम कर चलता चल
लक्ष्य को पाने की चाह को और तीव्र करता चल
मंजिल होगी सामने ज़िन्दगी जो देगी बदल
Friday, 7 October 2011
एक आहट
हलकी सी एक आहट से नींद टूटी
सपनो की नगरी पीछे छूटी
पर्दों से सरक आती किरणों ने होसला दिया
मुस्कराहट के साथ एक नए दिन का स्वागत किया
नन्ही हथेलियों का गालों को सहलाना
उन मासूम आँखों का बिन कुछ कहे सब कह जाना
दिन भर खुद को और बढ़िया करने में मशगूल करता है
जो आये थे सपने वो तो याद नहीं
पर उनको पूरा करने को मजबूर करता है
घूम के चक्र समय का फिर आ खड़ा होजायेगा
अँधेरे की ठंडक में सारा ताप खो जायेगा
शायद वो सपना फिर याद आ जाये
कैसे होगा पूरा यह बता जाये
या फिर शुरू से होगा आरंभ वो
और हर दिन होगा प्रारंभ यूँ
............
हलकी सी एक आहट से नींद टूटी
............
हलकी सी एक आहट से नींद टूटी
सपनो की नगरी पीछे छूटी
बहे जा रहा है जीवन मेरा
समुन्दर की लहरों की तरह
उठता गिरता
हिचकोलों के बीच
तट से मिलता बिछड़ता
रात में ठण्ड से सकपकाता
दिन में तपता....तेज़ से जगमगाता
हर गम हर ख़ुशी को खुद में समेटे
बहे जा रहा है जीवन मेरा
बहे जा रहा है जीवन मेरा
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